तेरी उम्मीद की हर आस मिट गई है
फिर दिल तेरा इंतज़ार करे किसलिए?
तेरी ओर जाने वाली हर राह गुम हो गई है
फिर हर राह की मजिल तेरा घर किसलिए?
जब ज़िन्दगी में छाया है घनघोर अँधेरा
फिर तेरी यादों के दिए किसलिए?
जब हर रहगुज़र खडा है नश्तर लिए हुए
हम अपना दिल दिखाएँ किसलिए?
ज़िन्दगी यूँ तो कट ही रही है मगर
फिर भी तेरे मिलने की आस है किसलिए?
Monday, April 13, 2009
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